मेरी कम्युनिस्टों से कोइ निजी दुश्मनी नहीं है पर इस सप्ताह उनके सिवाय और कोई ऐसा काम ही नहीं कर रहा हय जिस पर मैं कोई वक्तव्य करूं। अब इस खबर को ही लीजिये, पता नहीं इनको ईरान से इतना प्रेम क्यूं हो गया है। जहाँ तक मुझे समझ आता है, भारत के पास ईरान के खिलाफ़ वोट देने के लिये काफ़ी कारण हैं जो कि भारत के राष्ट्र हित में हैं।
- ईरान काफ़ी दिनों से पाकिस्तान के साथ आणविक रिसर्च कर रहा है और किसी को इस बात में संदेह नहीं होना चाहिये कि पाकिस्तान की आणविक रिसर्च केवल भारत के खिलाफ़ है। डा. कादिर का आणविक तंत्र ईरान के साथ काफ़ी काम कर रहा था।
- ईरान के काफ़ी करीबी देश (रूस, चीन) ने भी ईरान के खिलाफ़ वोट दिया है।
पिछ्ले सप्ताह के मामलों को देखने के बाद तो मुझे लगता है कि कम्युनिस्ट दल इस बात से काफ़ी भयभीत हैं कि भारत सॉफ़्ट्वेयर के क्षेत्र में चीन से काफ़ी आगे न निकल जाये और इस लिये किसी भी तरह से यह चाहतें हैं कि भारत को किसी तरह से चीन से पीछे रखा जाये। जब चीन में रहने वाले इनके मसीहा ही स्वतंत्र विदेश नीति नहीं अपना पा रहें हैं तो भारत अगर अपने भले की नीति अपनाता है तो इनको क्या समस्या है। खैर हम क्या कर सकते हैं, सिर्फ़ केरल और बंगाल मे रहने वाले भारतीय बंधु ही हमारी रक्षा कर सकते हैं।
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